परवीन शरीफ: क़लम के पीछे की एक रूह

1000001213

आपका इस्तेकबाल है मेरी तजुर्बों, ख्यालों, ख्वाहिशों, एहसासात की दुन्या में जहाँ आप अपना अक्स ढूँढ सकते हैं. चाहे आपकी ज़िन्दगी किसी भी भौगोलिक, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक परिस्थितियों में जलती बुझती हो. चाहे कोई भी उम्र, रंग, नस्ल, शिक्षा आपकी पहचान हो. क्यूंकि मुझे पता है आप भी अपनी ज़िन्दगी में कई राहों से गुज़रते हैं. ठहर कर कुछ को समझना चाहते लेकिन बहोत बार हार जाते हैं. कभी अच्छे हालात में संवरते रहना चाहते हैं और बुरे अनुभवों से बिखर जाते हैं. रास्तों में कुछ मोड़ पर ख्वाहिश होती है कोई मुझे समझे या समझाए, ज़िन्दगी की इस दोपहर की चट्केदार धुप में कोई साया मिल जाए. जहाँ दो पल सुकून के गुज़ार कर एक नए जज़्बे और ताकत के साथ वापिस सफ़र पर चल पडूं अपनी मंजिल की ओर. कभी कुछ लोगों से मिलते हैं जिनसे पहली मुलाकात में लगता है जैसे बरसो से जानते हैं और कभी सालों से लोगों के बिच रह कर भी अजनबी रह जाते हैं. कुछ लोग मिलते हैं जो ज़िनदगी के गोशे गोशे को रोशन कर देते हैं. फिर वही हमें अंधेरों के उस मोड़ पर छोड़ जाते हैं जैसे हमारा वुजूद अपने साथ ले गए हों. अधिकतर वही लोग दिल का दर्द बन जाते हैं जो दिलों में घरोंदे बनाते हैं. कभी सोचते हैं वो कर नहीं पाते और कभी कुछ ऐसा कर जाते हैं जो सोच भी नहीं सकते.

आप सोच रहे होंगे की ये कौन है जो कुछ कुछ मुझे जैसी है. मैं परवीन शरीफ,

1. इमोशनल इंटेलिजेंस लाइफ कोच (इंसाानी जज़्बात की रहनुमा)

“ज़िंदगी सिर्फ गुज़ारने का नाम नहीं, बल्कि अपने जज़्बात को समझकर उन्हें एक सही सिम्त (दिशा) देने का नाम है। एक इमोशनल इंटेलिजेंस कोच के तौर पर, मैं आपको वो महारत और तरीके सिखाती हूँ जिससे आप अपने डर, गुस्से और बेचैनी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना सकें। मेरा मक़सद आपको उस ज़हनी सुकून (mental peace) तक पहुँचाना है जहाँ आप पूरी एतमाद (confidence) और साफ़ नज़रियात के साथ अपनी ज़िंदगी के फैसले ले सकें।”

2. मेंटरशिप: हिकमत और किरदार की तामीर

“मेरा मेंटरशिप प्रोग्राम उन बेटियों और खवातीन के लिए है जो सिर्फ किताबी इल्म नहीं, बल्कि ‘हिकमत’ (Wisdom) की तलाश में हैं। पिछले 6 बरसों से मैं तालिबात (students) की शख्सियत को संवारने, उनमें अख़लाकी अक़दार (moral values) पैदा करने और उन्हें एक बा-किरदार औरत बनाने की मुसलसल कोशिश कर रही हूँ। यह सिर्फ एक सबक नहीं, बल्कि एक बा-इज़्ज़त और बा-मक़सद ज़िंदगी जीने का रास्ता है।”

img 20210721 wa0004

3. मुसन्निफ़: ‘एक सफ़र ख़ुद अपनी तलाश का’ 

“एक मुसन्निफ़ (Author) के तौर पर, मैंने अपनी किताब ‘एक सफ़र ख़ुद अपनी तलाश का’ उन अनकहे ख्यालों के नाम की है जिन्हें हम अक्सर खुद को बताना भूल जाते हैं। यह किताब एक आईना है जो आपकी असलियत को आपसे मिलवाता है। इसका हर लफ़्ज़ मोहब्बत, दर्द और ‘खुद-शनासी’ (self-discovery) की गहराइयों से गुज़रता है—यही वो बुनियाद है जिस पर ‘My Reflective Pen’ की इमारत खड़ी है। ” इस किताब के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करें https://myreflectivepen.com/ek-safar-khud-apni-talash-ka/

4. कॉलमनिस्ट: समाज और नफ़्सियात का संगम

“पिछले 13 बरसों से मेरे कॉलम समाजी मसाइल (social issues) और इंसानी नफ़्सियात (human psychology) के बीच एक पुल का काम कर रहे हैं। एक कॉलमनिस्ट के तौर पर मेरा काम सिर्फ लिखना नहीं, बल्कि उन नफ़्सियाती परतों को खोलना है जो हमारे समाज को बनाती हैं। मुशाहिदे (observation) और तहरीर का यह 13 साला सफ़र ही मेरे इस प्लेटफार्म की धड़कन है।”

“मेरा काम मेरा मक़सद है, लेकिन मेरा स्वभाव ज़िंदगी की उन छोटी खुशियों से बना है जो अक्सर नज़र-अंदाज़ हो जाती हैं। एक लेखक और मेंटर होने से परे, मैं एक ऐसी शख्सियत हूँ जो सादगी में गहराई और ख़ामोशी में सुकून तलाश करती है। आइए, मेरे उन अहसासों और पसंद से जुड़िये जो मेरी असली पहचान हैं।”

शब्दों की दुनिया में खो जाना और चाय की खुशबू के साथ ख़यालों को पन्नों पर उतारना मेरी रूह की ग़िज़ा (food for soul) है।

 मैं हर पल को गहराई से महसूस करती हूँ. छोटी छोटी अच्छी बातें, लोग और अनुभव मेरे पुरे वजूद को खुश कर देते हैं अगर वो मुकम्मल और सच्चाई से भरपूर हों तो. और इसका उलट दुखी भी कर देते हैं. मेरे लिए रिश्तों की बुनियाद सचाई और हमदर्दी (Empathy) पर टिकी है। मैं उन गुफ़्तगू की क़द्र करती हूँ जो दिखावे से पाक हों और जहाँ एक इंसान दूसरे इंसान के दर्द को बिना कहे समझ सके। बुरे अनुभवों की वजह से बचपन से दिल में कई सवाल उठते की लोग धोका क्यों देते हैं? क्यों दूसरों के एहसासों की परवाह नही करते? क्यों दिल दुखाते हैं? ऐसे अनगिनत “क्यों” दिल में तूफ़ान मचाते लेकिन कोई जवाब नहीं मिलता जो उन तूफानों को थाम सकें. जब मेरे साथ या किसी के साथ गलत होता तो बुरा इस बात का नहीं लगता की मेरे साथ ऐसा हुआ. बल्कि बुरा इस बात का लगता की कोई ऐसा कैसे कर सकता है. और अगर उसकी परिस्थितयों ने ऐसा करा भी दिया तो उस इंसान को एहसास क्यों नहीं होता की उससे जो गलती हुई है कोई उससे टूट चूका है, क्या अब वक़्त नहीं की उसके उन टूटे हुए रेजों को संवारा जाये. क्या एहसास, नैतिकता, गरिमा जैसे तत्वों को एक और रख कर इंसान सच में तरक्की कर सकता है. क्या तरक्की सिर्फ माद्दिय्यत का नाम है?

 यूँ थोडा बहोत तो मैं बचपन से लिखती आई हूँ. लेकिन ये मेरे अन्दर जूनून, ख़ुशी और शौक तब बना जब शिद्दत से एहसास हुआ की दुनिया की बुराइयां सिर्फ और सिर्फ इल्म से दूर हो सकती हैं. इल्म, जो मुहब्बत करना सिखाता है; इल्म, दुसरो को समझना सिखाता है; इल्म, खुद की गलतियाँ और बुराइयों को समझकर बेहतर बनना सिखाता है; इल्म, हमें इंसान बनाता है. तो मैंने अपने ढेर सारे ‘क्यों’ का जवाब इल्म से पाया. हर महसूस होने वाले पलों और अनुभवों को इल्म से समझकर उन्हें कलम से कागज़ पर उतारा और चाहत हुई की क्यों न एक एहसास ए ज़िम्मेदारी के साथ इस कलम से जो दिल में आवाज़ उठती है उसे लोगों के साथ साझा करूँ क्योंकि मेरा मानना है; तलवार चलाने की महारत, तजुर्बा और सही वार बुरे इंसान को ख़तम करती है लेकिन कलम की महारत और सही वार बुराइयों को ख़तम करती है, लोगों के दिलों को सुकून देती है. अगर आप खुद को संवारना चाहते हैं, कुछ संभलना चाहते हैं थोडा आस पास को समझना चाहते हैं तो क्या आप चलना पसंद करेंगे मेरे इन अनुभवों की सैर में कुछ पल मेरे साथ? चलेंगे न!! तो सब्सक्राइब करने में देर मत करियेगा!!

सूरत में मेरी किताब की रुनमाई, (launch) अज़मत के वो लम्हे: एक यादगार क़ौमी रुनमाई, (Moments of Grace)

1773636685227
img 20210805 wa0018
इस 13 साला मुसलसल सफर का सबसे हसीन पड़ाव सूरत के खूबसूरत शहर में मेरी किताब ‘एक सफ़र ख़ुद अपनी तलाश का’ का आगाज़ था। मेरे लिए वह पल निहायत ही आजिज़ी (humility) और शुक्र-गुज़ारी का था, जब मेरी बरसों की मेहनत को मुल्क की अज़ीम शख्सियात और दूरंदेश (visionary) लीडरों के सामने पेश किया गया। उनकी हौसला-अफ़ज़ाई और उस शाम की गर्मजोशी ने मेरे इस यक़ीन को और मज़बूत कर दिया कि दुनिया को आज रूहानी सुकून और शिफा (healing) की सख्त ज़रूरत है, और ख़ुद को पाने का सफर ही वो सबसे अहम रास्ता है जिस पर हमें चलना चाहिए।
 
सूरत में मेरी किताब की रुनमाई (launch) एक ऐसा रूहानी तजुर्बा था जिसे मैं हमेशा अपने दिल में सँजो कर रखूँगी। मुल्क की मुमताज़ (distinguished) शख्सियात और बड़े दानिशवर ताजिरों (businessmen) के दरमियान मौजूद होना मेरे लिए बा-इज़्ज़त मक़ाम था, जिनकी मौजूदगी ने उस शाम को एक वक़ार (dignity) अता किया।
मैं उन मोहतरम शख्सियात की मोहब्बत और शफ़क़त (kindness) देख कर दंग रह गई, जिन्होंने मेरे काम को इतने खुले दिल से सराहा। उनकी तरफ से दस्तख़त (signature) की हुई किताबों की गुज़ारिश मेरे लिए वो दुआएँ थीं जिन्हें मैंने बे-पनाह आजिज़ी के साथ कुबूल किया। उनके हाथों में अपनी किताब देखना इस बात की दलील थी कि ‘ख़ुद-शनासी’ (self-discovery) का यह सफर हम सबका मुश्तरका (shared) रास्ता है। मैं उनकी दुआओं और इस हौसला-अफ़ज़ाई के लिए तह-ए-दिल से शुक्र-गुज़ार हूँ।
 
error: Content is protected !!
Scroll to Top