
प्रेम: ज़ुबान से परे एक गहरा एहसास
प्रेम, एक छोटा सा शब्द, लेकिन ताकत इतनी कि सारी दुनिया को वश में कर ले। गहराई इतनी कि किसी पैमाने से न मापी जाए। विस्तार इतना कि यह किसी धर्म, संस्कृति या देश की धरोहर नहीं; इसे किसी ज़ुबान की ज़रूरत नहीं, न ही यह केवल इंसानों तक सीमित है। उदारता इतनी कि सारे मतभेदों के बावजूद हर किसी को गले लगा ले, बल्कि बुराइयों को भी अदा बना ले।
यह एक ऐसा एहसास है जिसे सिर्फ ज़ुबान से कहना बेमानी हो जाता है, जब तक सामने वाला आपके इस एहसास को महसूस न करे। गोया यह सिर्फ एक इंसान तक महदूद नहीं होता। वैसे तो प्रेम पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं, लेकिन फिर भी हर इंसान इसे अपने नज़रिए से महसूस करता है, जिसे शब्दों में बयान करना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
लेकिन मैं इतना कहूँगी कि प्रेम जब ज़ुबान से बयां हो, तो दिल और दिमाग पूरी तरह इस बात का साथ दें और हमारे काम या व्यवहार चीख-चीख कर यह गवाही दें कि—”हाँ, मुझे प्रेम है।”
प्रेम किसी को भी, किसी भी जानदार या बेजान से हो सकता है। उसे हर उस चीज़ से प्रेम हो जाता है जिसके वह बहुत करीब रहा हो। उसी में से एक है “देशप्रेम”, जो कि बहुत ही सहज और कुदरती तौर पर हर नागरिक के दिल में फूट पड़ता है, जिसका धर्म या ज़ुबान से कोई लेना-देना नहीं। यूँ तो प्रेम कभी बेवजह भी होता है, लेकिन जैसे-जैसे हम जिससे प्रेम करते हैं उसकी अच्छाइयाँ सामने आती हैं, प्रेम में गहराई आती जाती है।
हम आज तक इस देश पर गर्व करते आए हैं कि हमारे अंदर उदारता और प्रेम इतना कूट-कूट कर भरा हुआ है कि हम अलग-अलग नस्ल, रंगत, संस्कृति, आदतों, सोच, ज़ुबान और धर्म के होने के बावजूद एक-दूसरे में घुले हुए हैं। कोई हमें एक-दूसरे से जुदा नहीं लगता, सब अपने-अपने से लगते हैं।
जैसे हर रंग अपने आप में खूबसूरत होता है, लेकिन जब वह दूसरे रंगों के साथ मिलता है तो और ज़्यादा खूबसूरत लगता है; हर रंग की खूबसूरती निखरकर सामने आती है, और जब ये आपस में थोड़े घुलते हैं, तो एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली विशिष्ट पेंटिंग सा एहसास कराते हैं। तो क्यों न हो इस देश से प्रेम?
देशप्रेम क्या है? ज़मीन का टुकड़ा या यहाँ के लोग?
जब हम प्रेम करते हैं, तो उसकी हर चीज़ से प्रेम हो जाता है। क्योंकि देश सिर्फ नक्शे और ज़मीन तक महदूद नहीं है; इसमें बसने वाले हर एक इंसान, जानवर, कानून, व्यवस्थाएँ, पहाड़, नदी, जंगल और संस्कृति मिलकर देश कहलाते हैं। इसके हर छोटे से छोटे टुकड़े से प्रेम असल में देशप्रेम ही है।
जब एक नागरिक सभी असमानताओं के बावजूद पड़ोसियों, सहपाठियों और दोस्तों से घुल-मिलकर रहता है; जब वह कानून का पालन करता है; जब वह व्यापार करता है, पढ़ता-लिखता है, अपनी सेवाएँ देकर देश से कंधा मिलाकर चलता है और हर क्षेत्र में अपने देश का नाम रोशन करता है—तब वह देश को तोड़ने की बात नहीं करता।
आज भी सरहदों पर पड़ोसी देशों के दुश्मनों की गोलियों का मुकाबला कर सैनिक हम सब की हिफाज़त करते हैं। आज जो हम एक मज़बूत अर्थव्यवस्था बनते जा रहे हैं और दुनिया भर में नाम रोशन कर रहे हैं, वह सब एक-दूसरे के सहयोग से ही मुमकिन हुआ है। असमानताओं के बावजूद हमने एक-दूसरे को सुविधाएँ दीं और लीं। शरीर के हर एक अंग की अपनी पहचान, ज़रूरत और महत्व होता है; यह सब प्रेम ही तो है।
इतिहास और धर्म भी देते हैं इस सद्भाव की गवाही
हम अपने दोस्तों और परिवार के साथ कई मीठी यादें बनाते हैं। हर क्षेत्र में तरक्की होते देखते हैं; जब एक सड़क भी बनती है तो खुश हो जाते हैं। हम अपने एहसासों, खून, पसीने, अरमानों और वक्त को गूँथकर, अपनी ज़िंदगी को तपाकर खुद को संवारते हैं, और यह सब इसी ज़मीन पर होता है। यहीं हम जलते-बुझते हैं, कुछ पाते हैं और कुछ खोते हैं। चूँकि हर एक भारतीय—चाहे वह किसी भी धर्म का हो—उसके अंदर नर्मदिली, प्रेम, स्नेह और संवेदनशीलता जैसे एहसास मौजूद हैं, तो क्यों न हो उसे इस देश से प्रेम?
इस प्रेम की गवाही तो इतिहास भी देता है कि कैसे हर एक भारतीय ने सैकड़ों सालों से बाहरी दुश्मनों से अपना सब कुछ कुर्बान करके मुकाबला किया। शायद हमारी जीत की बड़ी वजह असमानताओं से परे व्यापक उदारता, विविधताओं का सम्मान करना और सबको अपना समझना ही रही होगी। क्योंकि अगर परिवार ही कमज़ोर हो, तो वह बाहरी आपदाओं का मुकाबला कैसे कर सकता है? हमने कभी इसी देश में रहकर किसी देशवासी से बैर और नफरत करना नहीं सीखा। तो क्यों न हो इस देश से प्रेम?
“वतन से मोहब्बत ईमान का हिस्सा है”
प्रेम तो हर धर्म सिखाता है। उदाहरण के तौर पर इस्लाम को लीजिए—इसमें नेअमतों की कद्र, इज़्ज़त और प्रेम करना इबादत का दर्जा रखता है। इसी सिलसिले में एक बहुत ही मशहूर और विचारशील रिवायत है:
“हुब्बुल वतनि मिनल ईमान” (वतन से मोहब्बत करना ईमान का हिस्सा है)।इन नेअमतों में से एक बड़ी नेअमत यह भी है कि मुसलमान भारत की सरज़मीं पर पैदा हुए; इसकी कद्र और इससे प्रेम हर मुसलमान को होना चाहिए।
यह वह ज़मीन है जिसे दुनिया भर के मुस्लिम देश भी मानते हैं कि यहाँ इल्म (ज्ञान) के दरिया बहते हैं। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया था कि:
“मुझे अल-हिंद (भारत) से ठंडी हवा के झोंके आ रहे हैं।”यहाँ के मुसलमान तो दुनिया भर के मुसलमानों के लिए मिसाल हैं; यह देश की गरिमा ही तो है। आज मुसलमान सबसे ज़्यादा कहीं सुरक्षित है तो भारत में है। गोया हमने अब तक दुनिया भर को संदेश दिया है कि भारत सभी असमानताओं के बावजूद हर किसी की सुरक्षा का ख़याल रखता है। तो क्यों न हो इस देश से प्रेम?
प्रांतीय भाषा और जन्मभूमि से जुड़ाव
मैं बचपन से नागपुर में पली-बढ़ी। अब महाराष्ट्र में नहीं हूँ, लेकिन आज भी अगर कहीं कोई मराठी बोलता हुआ या महाराष्ट्रीयन दिख जाए, तो मुझे ऐसी खुशी होती है जैसे कोई बचपन का जिगरी दोस्त मिल गया हो। अपनी प्रांतीय भाषा और प्रांत से प्रेम असल में देशप्रेम ही है।
हमें तो देश के कोने-कोने (गोशे-गोशे) से प्रेम है। जब ‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा’ की सिर्फ धुन भी बजती है, तो दिल खुशी से झूम उठता है, सीना गर्व से फूल जाता है। ऐसा लगता है जैसे यह प्रेम बिल्कुल नया-नया हो—यह प्रेम तो बार-बार होता है।
कोई वजह तो बताइए कि मुझे, आपको, हम सबको क्यों न हो इस देश से प्रेम? हम हर एक देशवासी के पास धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, दिली, स्वाभाविक और प्राकृतिक जैसी कई वजहें हैं इस देश से प्रेम करने की, तो क्यों न हो इस देश से प्रेम?
प्रेम का कोई प्रमाणपत्र नहीं होता
प्रेम का प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता,
इस पर कोई अपनी फतेह के झंडे नहीं लहरा सकता,
इस पर कोई अपना एकाधिकार नहीं जता सकता,
इसे तो बस महसूस किया जा सकता है।
हर देशवासी के छोटे-छोटे सकारात्मक व्यवहार से महसूस कीजिए कि—
“हाँ! यह देशप्रेमी ही है।”✍️ लेखिका: परवीन शरीफ (Parveen Sharif)
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