तआरुफ़ रोग हो जाए तो उसका भूलना बेहतर
तअल्लुक़ बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
छोड़ना, यह लफ़्ज़ छोटा तो बहुत है जिसे कहना और समझाना तो आसान है मगर इसे समझना और अमल करना उतना ही मुश्किल। छोड़ना लफ़्ज़ जैसे ही आता है, भावनात्मक उथल-पुथल शोर मचाने लगती है। छोड़ देने के नाम से ही डर लगता है।
छोड़ना मुश्किल हो जाता है—कभी किसी शख्स को, कभी किसी बीते हुए कल की याद को, कौन सही कौन गलत की बहस को, कुछ बुरी आदतों को, कुछ महकते ख़्यालों को, कुछ पाने के लिए अपने आराम को, कभी मीठी नींद को, कभी तड़पते सवालों को, कभी धड़कते अधूरे ख़्वाबों को, तो कभी दिल में छुपे गहरे दर्द को।
छोड़ देने का मतलब है अल्लाह की रज़ा में राज़ी रहना। ये तस्लीम कर लेना कि अल्लाह तआला ने मेरे मुकद्दर में जो लिखा है, वही मेरे लिए सही है। क्योंकि वह अपने बंदों के लिए जो करता है, वह उनके हक़ में बेहतर होता है। हमारी छोटी-सी अक्ल को नहीं पता कि हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत है—अल्लाह बेहतर जानता है। जैसे कि अल्लाह तआला क़ुरआन में फ़रमाता है:
“शायद तुम्हें वह चीज़ नापसंद आए जो तुम्हारे लिए बेहतर है, और शायद तुम्हें वह चीज़ पसंद आए जो तुम्हारे लिए बुरा है। अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते।” (सूरह अल-बक़रह: 216)
तो ज़ाहिर सी बात है कि जाने देने में आपकी भलाई है—वह चीज़ आपके लिए सही नहीं थी, वह आपको बर्बाद कर देती या आपको दर्द देती। आज भले ही कोई चीज़ आपसे ले ली गई हो, अल्लाह उससे बेहतर चीज़ ज़रूर देगा और वह ज़रूर देगा।
यहाँ छोड़ने का मतलब है यह कहना कि “चलता है, जाने दो… जो होता है अच्छे के लिए होता है।” अगर इंसान इस तरह से खुद को नहीं बनाता और चीज़ों के पीछे भागता रहता है, जाने नहीं देता, छोड़ता नहीं तो फिर ज़िंदगी में बहुत-सी बीमारियाँ घर कर लेती हैं। फिर इंसान झेल नहीं पाता—दिल का दौरा पड़ जाता है, डायबिटीज़ हो जाती है, स्ट्रोक आ जाता है। डायबिटीज़ चीनी खाने से नहीं होती, मीठा खाने से नहीं होती—बल्कि स्ट्रेस से, टेंशन से होती है। इसलिए जाने दो जो जा रहा है। कभी हार मान लो। ध्यान उस पर दो कि जो छूट गया, उससे आपने क्या सीखा। बीते हुए वक़्त में जीना तो नहीं चाहिए, मगर बीते हुए वक़्त से मिली सीख को साथ लेकर ज़रूर आना चाहिए।
जब ज़िंदगी में कुछ न मिले तो मन ही मन में खुद को बधाई देना कि “अल्लाह ने मुझे बचा लिया।” क्योंकि इससे बेहतर आपका इंतज़ार कर रहा है और देखिएगा, उससे बेहतर आपको मिलेगा भी।
छोड़ने के वक़्त नींद नहीं आएगी, करवटें बदलते रहेंगे, थोड़ी बेचैनी तो होगी ही। अगर यह बेचैनी नहीं आई तो ज़िंदगी में मज़ा क्या आया।
जब पेड़ में नए पत्ते आने वाले होते हैं तो पेड़ अपने पुराने पत्तों को झाड़ देता है ताकि नए पत्तों के लिए जगह बन जाए। जब कुछ नया मिलने वाला होता है तो पुरानी चीज़ें अपने आप झरने लगती हैं ताकि नई चीज़ों के लिए जगह बने। जब जगह बन रही हो तो घबराएँ नहीं—उसका इस्तिक़बाल करें।

तो जाने देने और छोड़ देने का मतलब होता है कि जो अल्लाह तआला ने हमारे लिए लिख दिया है, उसे क़बूल करना और इस बात का यक़ीन करना कि वह हमारे हक़ में बेहतर ही फ़ैसला लेता है।
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीस है:
“अगर अल्लाह तुम्हें कुछ देना चाहे और सारी दुनिया मिलकर उसे तुमसे छीनना चाहे तो छीन नहीं सकती, और अगर अल्लाह तुमसे कुछ रोकना चाहे तो सारी दुनिया मिलकर भी तुम्हें वह नहीं दे सकती।”
